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नोटबंदी के एक साल का रिपोर्ट कार्ड- पढ़े पूरी खबर विस्तार से..

-नोटबंदी को पूरे हुये एक साल

-जानें कैसा रहा देश का हाल

आज नोटबंदी के एक साल पूरे हो गये हैं। जी हां पिछले वर्ष आज हि के दिन यानि कि 8 नवंबर 2016 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुराने 1000 और 500 के नोटों का चलन बंद कर दिया था। जिसके बाद पूरे भारत में एक तरह से नोटों को लेकर इमेरजेंसी जैसे हालात हो गये। आज हम आपको नोटबंदी के एक साल पूरा होने का फूल डीटेल देंगे। हम आपको बतायेंगे की इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या फर्क पड़ा। तो आइये देखते है शुरु से लेकर अबतक का हाल……..

8 नवंबर 2016–  ना भूलने वाली तारीख

यह एक ऐसी तारीख है जिसे शायद ही कोई भारतीय अबतक भूल पाया होगा। जी हां इसी दिन भारत के प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश जारी करते हुये 500 और 1000 की नोट को तत्काल प्रभाव से बंद करने का ऐलान किया था। प्रधानमंत्री के इस निर्णय से भारत की जनता को कुछ पल के लिये झटका  सा लगा था। जिसके बाद हर किसी की जुबान पर बस एक ही लब्ज था। नोटबंदी, नोटबंदी और सिर्फ नोटबंदी। इसी में मोदी ने कहा कि जिस किसी के पास पुरानी करेंसी है वो 31 दिसंबर तक आपनी करेंसी को बैकों के जाकर बदलवा सकता है।

बैकों की क्या रही भूमिका-

नोटबंदी के बाद बैंको पर इसका सबसे तगड़ा प्रभाव पड़ा। देश की चलन में रहने वाली 86% करेंसी को एक साथ महज चंद दिनों में बदल पाना सचमुच एक बड़ी चुनौती थी। इस नोटबंदी में देश के सरकारी, गैर-सरकारी और सहकारी बैकों को महज 50 दिन का समय दिया गया। कई छोटे बैकों पर इसका अच्छा असर पड़ा और उनकी बेल्थ भी बढ़ी मगर बड़े बैंको को ज्यादा परेशानिया उठानी पड़ी। इस बीच रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी मुख्य भूमिका रही और इस आपात जैसी स्थिती को कैसे संभाला जा सके इसपर ढ़ेर सारे नियम कानून भी निकाले।

आम जनता ज्यादा हुई परेशान-

वैसे तो इस निर्णय से भारत के हर वर्ग को कोई ना कोई समस्या तो उठानी पड़ी मगर इससे सबसे ज्यादा परेशानी आम जनता को हुई। अचानक से लिया गया ये निर्णय उन लोगों पर भारी पड़ी जिनके घरों में कोई जरुरी काम जैसे शादी और इलाज में भी काफी दिक्कते हुई। आम जनता को अपना सारा काम छोड़कर बैंको की लाइन में लगाना पड़ा। कभी नोट बदलवाने के लिये तो कभी एटीएम से पैसे निकलवाने के लिये। इस बीच सबसे दुखद बात ये रही कि लाइनों में लगने से और असुविधाओं के कारण 100  से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। कई लोगों को मकान का किराया, घर का राशन और छोटी जरुरतों के लिये लोगों को बड़ी परेशानीयां उठानी पड़ी।

सरकार ने भ्रष्ट्राचार रोकने के लिये लिया था निर्णय –

नोटबंदी पर सरकार ने अपनी बात रखते हुये कहा था कि यह फैसला भ्रष्ट्राचारीयों पर लगाम लगाने के लिये है। शुरु-शुरु में इसका असर देखने को भी मिला। कई लोगों ने अपने पास रखा हुआ असिमीत काला धन नदियों में बहा दिया। कुछ लोगों नें खुले में फेक दिया तो कुछ दुसरे तरीके से नोट बदलावाने की कोशिश में पकड़े गये। इसमें कुछ प्राइवेट बैंको और मेनेजरों के नाम भी सामने आये। मगर आज नोटबंदी के एक साल पूरा होने करे बाद इसका कोई साकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिला।

अर्थव्यवस्था पर कैसे पड़ा फर्क –

जिस वक्त नोटबंदी का निर्णय लिया गया उस वक्त देश की जी.डी.पी अपने उच्चतम स्तर पर थी। उस वक्त जी.डी.पी का स्तर 6.5 तक की उचाइयों को छु रहा था। मगर नोटबंदी के एक साल होने पर इस वक्त भारत की जी.डी.पी लगभग 5.5 तक पहुच गई है। हांलाकि अर्थव्यवस्था पर थोड़ा असर जीएसटी के कारण भी पड़ा है। लेकिन ज्यादातर विशेषज्ञ इसे नोटबंदी के कारण आई मंदी  से जोड़ कर देख रहे हैं।

सचमुच था एक साहसी निर्णय-

नोटबंदी के इस निर्णय को देखा जाये तो किसी भी सरकार के लिये यह एक चूनौती से भरा हुआ निर्णय होगा। लेकिन केंद्र की मोदी सरकार यह निर्णय लिया। हांलाकि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने भी बीते समय में ऐसा निर्णय लेने का सोचा था। मगर उस वक्त यह निर्णय नहीं लिया गया।

क्या रही राजनीतिक दलों की भूमिका-

केंद्र सरकार के इस फैसले को बीजेपी और उसके समर्थित दल जहां एक साहसी सही निर्णय बता रहे थे। वहीं विपक्ष नें इस मामले को बड़े ही व्यापक स्तर पर उठाया। निर्णय के विरोध में कई सारे विपक्षी दल एक जुट होकर संसद में भी अपनी बात रखी मगर इसका आम जनता पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा।

शुरुआत में लोगों ने किया था समर्थन-

अगर शुरुआत से देखें तो आम लोगों ने मोदी के इस फैसले का जमकर समर्थन किया था। जिसका ही असर ये हुआ की शुरुआती दौर में ये फैसला सही माना गया। और इसी वजह से विपक्षी दल भी सही ढंग से अपना विरोध दर्ज नहीं करवा पाये।

आज क्या हैं हालात-

वर्ष 2016 के आखिरी महिने में लिया गया ये निर्णय वर्ष 2017 में पूरे साल एक गर्म मुद्दा रहा। सरकार की तरफ से कोई भी काम शुरु  किया जाये तो उन्हें नोटबंदी की याद दिलाना कोई नहीं भूला। आज अगर इस निर्णय का समीक्षा करें तो इसका हमारे देश की जीडीपी पर जरुर थोड़ा असर पड़ा है। काला धन रखने वालों पर लगाम तो लगी है। मगर शायद उस हद तक नहीं लगी जैसा सरकार ने सोचा था। इसपर आज आम जनता की मिली-जूली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

 

 

 

 

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